रायपुर। छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला चिकित्सालय में चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ ने गंभीर हालत में भर्ती महज 900 ग्राम वजन के नवजात को बचाने में सफलता हासिल की है। समय से पहले जन्मे इस बच्चे को सांस लेने में परेशानी और गंभीर एनीमिया की समस्या थी। करीब दो महीने तक चले उपचार और विशेष देखभाल के बाद उसकी हालत में सुधार हुआ। इसके बाद 8 अक्टूबर 2026 को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।यह मामला दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं और नवजात शिशुओं के उपचार में विशेष देखभाल की भूमिका को उजागर करता है।
जन्म के समय बेहद नाजुक थी शिशु की हालत
गौरेला विकासखंड के चुकतीपानी गांव की निवासी गोमती के बच्चे का जन्म समय से पहले हुआ था। जन्म के समय उसका वजन केवल 900 ग्राम था। सांस लेने में दिक्कत और गंभीर एनीमिया के कारण उसकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई थी।शिशु की गंभीर हालत को देखते हुए उसे जिला चिकित्सालय की विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में भर्ती कराया गया। यहां चिकित्सकों और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ ने तत्काल उपचार शुरू करते हुए उसकी सेहत की लगातार निगरानी की।
ऑक्सीजन सपोर्ट के साथ दो यूनिट रक्त चढ़ाया
इलाज के दौरान नवजात को लगभग दो सप्ताह तक ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया। गंभीर एनीमिया से निपटने के लिए उसे दो यूनिट रक्त भी चढ़ाया गया। इसके अलावा शरीर का तापमान सामान्य बनाए रखने और पर्याप्त पोषण देने के लिए जरूरी चिकित्सकीय प्रबंध किए गए।बच्चे का वजन बढ़ाने और उसकी सेहत में सुधार के लिए कंगारू मदर केयर (केएमसी) तथा नियमित फीडिंग पर विशेष ध्यान दिया गया। लगातार निगरानी और उपचार के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उसकी हालत बेहतर होने लगी। करीब दो महीने में उसका वजन बढ़कर 1.35 किलोग्राम पहुंच गया। स्वास्थ्य में संतोषजनक सुधार के बाद 8 अक्टूबर को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
दूरस्थ गांव के परिवार को जिला अस्पताल में मिला सहारा
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जैसे वनांचल बहुल जिले में गंभीर स्थिति वाले नवजात का सफल उपचार जिला स्तर पर उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं की उपयोगिता दर्शाता है। दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए समय पर उपचार और विशेषज्ञ निगरानी बेहद महत्वपूर्ण होती है।जिला चिकित्सालय की एसएनसीयू इकाई ने इस मामले में अहम भूमिका निभाई। कम वजन और समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों को विशेष निगरानी, पोषण और चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है। ऐसे में जिला अस्पतालों में उपलब्ध विशेष इकाइयां नवजातों के उपचार में महत्वपूर्ण सहारा बनती हैं।
चिकित्सकीय टीम की मेहनत से संभव हुआ उपचार
नवजात के उपचार में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. रामेश्वर शर्मा के मार्गदर्शन और सिविल सर्जन डॉ. देवेन्द्र सिंह पैकरा के निर्देशन में चिकित्सकीय टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. भरत भूषण त्रिपाठी, डॉ. अनिश ताम्रकार, डॉ. श्याम और एसएनसीयू के नर्सिंग स्टाफ ने बच्चे की देखभाल, पोषण प्रबंधन और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण सुनिश्चित किया।टीम के सामूहिक प्रयासों से गंभीर स्थिति में भर्ती नवजात की सेहत में सुधार हुआ और उसे घर भेजना संभव हो सका।
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ग्रामीण, आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने तथा शासकीय अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराने पर जोर दे रही है। मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के प्रयासों में एसएनसीयू जैसी इकाइयां अहम योगदान देती हैं।महज 900 ग्राम वजन के साथ जीवन के लिए संघर्ष करने वाले नवजात का स्वस्थ होकर घर लौटना उसके परिवार के लिए बड़ी राहत है। यह घटना चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों के समर्पण के साथ-साथ गंभीर मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने में सरकारी अस्पतालों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करती है।

