इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 13 सप्ताह की गर्भवती एक विवाहित महिला को गर्भपात की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित अवधि के भीतर गर्भ जारी रखना है या नहीं, इसका निर्णय लेने का अधिकार महिला का है। ऐसे मामलों में पति की सहमति अनिवार्य नहीं मानी जा सकती।
वैवाहिक विवाद के बीच पहुंचा मामला अदालत
यह मामला इंदौर संभाग के एक दंपती से जुड़ा है, जिनका विवाह करीब दो वर्ष पहले हुआ था। समय के साथ दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगा और महिला पति से अलग रहने लगी। इसी दौरान वह 13 सप्ताह की गर्भवती थी। महिला ने अदालत में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में बच्चे को जन्म देना उसके और होने वाले बच्चे, दोनों के भविष्य के लिए उचित नहीं होगा।
महिला के अधिकार को दी प्राथमिकता
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने माना कि गर्भावस्था को जारी रखने या समाप्त करने का निर्णय महिला की शारीरिक स्वतंत्रता और प्रजनन अधिकार से जुड़ा विषय है। यदि मामला कानून में निर्धारित समयसीमा के भीतर है और कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो इस फैसले का अधिकार महिला के पास है।
पति की सहमति जरूरी नहीं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि गर्भपात के लिए पति की सहमति को अनिवार्य नहीं माना जा सकता। कानून महिला को अपने शरीर और मातृत्व से जुड़े निर्णय स्वयं लेने का अधिकार देता है। ऐसे मामलों में उसकी इच्छा और परिस्थितियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
29 जून को सुनाया गया आदेश
इंदौर खंडपीठ ने यह आदेश 29 जून 2026 को पारित किया। इस फैसले को महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या के रूप में देखा जा रहा है।

