नई दिल्ली: सरदार सरोवर परियोजना की निर्माण लागत और नर्मदा अवॉर्ड से जुड़ा करीब 24 वर्षों पुराना विवाद आखिरकार समाप्त हो गया। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने वन टाइम सेटलमेंट समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस फैसले के साथ वर्षों से लंबित वित्तीय दावों और देनदारियों का निपटारा करने पर सहमति बन गई।
मध्यप्रदेश को नहीं मिली उम्मीद के मुताबिक राहत
समझौते से पहले मध्यप्रदेश सरकार ने सरदार सरोवर बांध से प्रभावित भूमि और मुआवजे के आधार पर 7,669 करोड़ रुपये की मांग की थी। हालांकि अंतिम समझौते के तहत मध्यप्रदेश को राशि मिलने के बजाय गुजरात सरकार को 550 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। इस कारण इस समझौते को प्रदेश के लिए आर्थिक दृष्टि से नुकसानदायक माना जा रहा है।
दो दशक से अधिक समय से अटका था मामला
सरदार सरोवर परियोजना की निर्माण लागत में चारों राज्यों की हिस्सेदारी और आपसी भुगतान को लेकर वर्ष 2002 से विवाद चल रहा था। लागत वितरण और लंबित देयों को लेकर कई दौर की चर्चा के बावजूद समाधान नहीं निकल पाया था। अब वन टाइम सेटलमेंट के जरिए सभी लंबित दावों का अंतिम निपटारा कर दिया गया है।
चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने किए हस्ताक्षर
समझौते पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने हस्ताक्षर किए। बैठक में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल भी उपस्थित रहे।
अमित शाह ने बताया राष्ट्रीय हित का फैसला
समझौते के बाद अमित शाह ने कहा कि जल संसाधनों को राजनीतिक विवाद के बजाय राष्ट्रीय संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि इस निर्णय से चारों राज्यों के किसानों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।
डूब क्षेत्र बढ़ने से बढ़ी मध्यप्रदेश की चुनौती
सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ने के बाद मध्यप्रदेश में प्रभावित क्षेत्र का दायरा भी बढ़ा है। वर्ष 2002 में जहां 178 गांवों की लगभग 15,626 हेक्टेयर भूमि डूब क्षेत्र में थी, वहीं बाद में यह बढ़कर 192 गांवों की करीब 20,822 हेक्टेयर भूमि तक पहुंच गई। इससे प्रदेश की लगभग 5 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन जलमग्न हो गई।
दोनों राज्यों ने किए थे बड़े वित्तीय दावे
मध्यप्रदेश ने नए भूमि अधिग्रहण कानून और बाजार दरों के आधार पर 7,669 करोड़ रुपये का दावा किया था। दूसरी ओर गुजरात ने वर्ष 2001 की दरों के अनुसार भुगतान की बात करते हुए बांध निर्माण और रखरखाव लागत में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी के रूप में 5,516 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी का दावा किया था। लंबे समय तक चले इस विवाद का अंत अब वन टाइम सेटलमेंट के जरिए हो गया है।

