रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण और सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के 3:15 बजे रायपुर एम्स में निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहीं तीजन बाई का उपचार एम्स में जारी था। उनके निधन की खबर से प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के कला और सांस्कृतिक जगत में गहरा शोक छा गया है।
मुख्यमंत्री ने जताया गहरा दुख
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। बताया गया कि उन्होंने शनिवार रात उनके परिजनों से फोन पर बातचीत कर स्वास्थ्य की जानकारी भी ली थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्वितीय कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पहचान दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाई और उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकेगी।
पंडवानी को दिलाई विश्व स्तर पर पहचान
तीजन बाई ने पंडवानी गायन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। महाभारत की कथाओं को अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और भावपूर्ण प्रस्तुति के साथ जिस अंदाज में उन्होंने मंच पर जीवंत किया, वह उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई। विशेषकर दुशासन वध जैसे प्रसंगों की प्रस्तुति ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
देश-विदेश में बिखेरा कला का जादू
सांस्कृतिक राजदूत के रूप में तीजन बाई ने इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस सहित कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर भारतीय लोककला का परचम लहराया। उनकी प्रस्तुतियों ने विदेशी मंचों पर भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
देश के सर्वोच्च सम्मानों से हुईं सम्मानित
लोककला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2007 में नृत्य शिरोमणि सम्मान, 2017 में खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय से डी.लिट की मानद उपाधि सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उन्हें जापान के प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
संघर्षों से शुरू हुआ था प्रेरणादायक सफर
8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड के अटारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन आर्थिक कठिनाइयों में बीता। मां सुखवती देवी के लोकगीत और पिता हुनुकलाल पारधी की बांसुरी ने उनके मन में संगीत के प्रति गहरी रुचि पैदा की। तीजा के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम तीजन रखा गया।
9 साल की उम्र में शुरू हुई पंडवानी की साधना
तीजन बाई ने अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से महज 9 वर्ष की उम्र में पंडवानी सीखना शुरू किया। 13 वर्ष की आयु में उन्होंने चंदखुरी के सतीचौरा चौक में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उनकी प्रतिभा जल्द ही गांवों से निकलकर बड़े शहरों तक पहुंच गई। भोपाल के भारत भवन में प्रस्तुति के दौरान उनकी कला से प्रभावित होकर प्रसिद्ध रंगकर्मियों ने उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुति का अवसर दिलाया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
लोककला की दुनिया में हमेशा अमर रहेंगी तीजन बाई
डॉ. तीजन बाई केवल एक कलाकार नहीं थीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का सबसे मजबूत चेहरा थीं। उनकी आवाज, उनकी शैली और पंडवानी के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। भारतीय लोककला में उनका योगदान सदैव अमिट रहेगा।

