बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शिक्षा विभाग में प्रशासनिक पदों पर शिक्षकों की तैनाती को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शिक्षण संवर्ग के किसी भी शिक्षक या व्याख्याता को सीधे विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) जैसे प्रशासनिक पद का प्रभार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने इसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम और सेवा नियमों के विपरीत बताते हुए संबंधित आदेश को निरस्त कर दिया।
लेक्चरर को बीईओ बनाने का आदेश हुआ रद्द
जस्टिस बीडी गुरु की एकलपीठ ने सूरजपुर जिले के प्रतापपुर में पदस्थ अंग्रेजी के व्याख्याता अरुण कुमार पांडेय को प्रभारी बीईओ बनाए जाने के आदेश को अवैध करार दिया। कोर्ट ने कहा कि यह नियुक्ति शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 27 और लागू सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।
क्या था पूरा मामला
याचिकाकर्ता मुन्नू सिंह धुर्वे वर्ष 2015 से सहायक विकासखंड शिक्षा अधिकारी (एबीईओ) के पद पर कार्यरत हैं। 14 जून 2021 को उन्हें प्रतापपुर का प्रभारी बीईओ बनाया गया था।बाद में 10 जून 2026 को स्कूल शिक्षा विभाग ने नया आदेश जारी कर उनका प्रभार वापस लेते हुए शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बासदेई के व्याख्याता अरुण कुमार पांडेय को प्रभारी बीईओ नियुक्त कर दिया। इस आदेश को मुन्नू सिंह धुर्वे ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अनुसूचित क्षेत्र का दिया गया था तर्क
प्रतिवादी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि प्रतापपुर अनुसूचित क्षेत्र में आता है और विभागीय नियमों के अनुसार वहां केवल ट्राइबल कैडर के अधिकारी ही पदस्थ किए जा सकते हैं। चूंकि याचिकाकर्ता एजुकेशन कैडर से हैं, इसलिए वे उस पद पर बने रहने के पात्र नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा, शिक्षकों को पढ़ाने का काम ही करना चाहिए
हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2026 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षकों को केवल अपवाद स्वरूप चुनाव, जनगणना या आपदा जैसी परिस्थितियों में ही गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया जा सकता है। सामान्य परिस्थितियों में उन्हें प्रशासनिक पदों पर तैनात करना कानून के खिलाफ है।
फीडर कैडर से बाहर होने पर नहीं मिल सकती जिम्मेदारी
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बीईओ का पद निर्धारित पदोन्नति व्यवस्था के तहत भरा जाता है। नियमों के अनुसार 75 प्रतिशत पद एबीईओ से पदोन्नति के जरिए और 25 प्रतिशत पद हाई स्कूल के प्राचार्यों से भरे जाते हैं।अदालत ने कहा कि अरुण कुमार पांडेय न तो एबीईओ हैं और न ही प्राचार्य। केवल व्याख्याता होने के कारण वे बीईओ पद के निर्धारित फीडर कैडर में शामिल नहीं हैं। इसलिए उन्हें इस पद का प्रभार देना नियमों के अनुरूप नहीं है।
ई कैडर और टी कैडर नहीं, कानून सबसे बड़ा मुद्दा
जस्टिस बीडी गुरु ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले का मुख्य प्रश्न ई कैडर और टी कैडर का नहीं है। असली मुद्दा यह है कि क्या शिक्षण संवर्ग के कर्मचारी को प्रशासनिक जिम्मेदारी दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि शिक्षण और प्रशासनिक संवर्ग की भूमिका, अनुभव और कार्य प्रकृति अलग-अलग होती है, इसलिए दोनों का आपस में स्थानापन्न उपयोग नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट का स्पष्ट संदेश
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के 10 जून 2026 के आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त करते हुए मुन्नू सिंह धुर्वे की याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भविष्य में शिक्षण संवर्ग के कर्मचारियों को सीधे प्रशासनिक पदों का प्रभार देने से विभाग को बचना चाहिए, क्योंकि यह कानून और सेवा नियमों के अनुरूप नहीं है।

