एक यूनिट बंद, अब पूरे प्लांट पर मंडरा रहा खतरा
कोयले की कमी का असर HTPS की उत्पादन क्षमता पर पहले ही दिखाई देने लगा है। 210 मेगावाट क्षमता वाली एक यूनिट को बंद किया जा चुका है। अब आशंका जताई जा रही है कि यदि कोयले की नियमित आपूर्ति बहाल नहीं हुई तो प्लांट की अन्य यूनिटों के संचालन पर भी असर पड़ सकता है।इस बीच कुछ लोगों की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा की जा रही हैं, जिससे CSEB के संयंत्रों के निजीकरण का रास्ता आसान हो सके। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
कोटा प्लांट में भी घटा कोयले का भंडार
कोयले की आपूर्ति में कमी का असर केवल कोरबा तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। कोटा क्षेत्र स्थित सुपर थर्मल पावर प्लांट में भी स्टॉक घटने की जानकारी सामने आई है।छत्तीसगढ़ और सिंगरौली क्षेत्र की कोयला खदानों में पानी भरने के कारण खदानों से कोयले की आवक प्रभावित हुई है। इसके चलते कोटा प्लांट में करीब पांच दिन का स्टॉक बचा बताया जा रहा है।1240 मेगावाट क्षमता वाले इस प्लांट की सातों यूनिट को चलाने के लिए प्रतिदिन करीब 12 से 15 हजार मीट्रिक टन कोयले की जरूरत होती है। ऐसे में आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई तो यहां भी उत्पादन व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
देश के बिजली तंत्र के लिए क्यों अहम है छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य से देश के कुल कोयला उत्पादन में करीब 18 से 20 फीस तक योगदान बताया जाता है। राज्य में सालाना 204 मिलियन टन से अधिक कोयला उत्पादन होता है।ऐसे में राज्य के बड़े पावर प्लांटों में कोयले की कमी केवल स्थानीय स्तर की समस्या नहीं है। यदि लंबे समय तक खदानों से आपूर्ति प्रभावित रहती है और पावर प्लांटों में पर्याप्त स्टॉक नहीं बन पाता, तो इसका असर बिजली उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
बारिश थमने और आपूर्ति बढ़ने पर टिकी नजर
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती प्लांटों में कोयले का पर्याप्त भंडार बनाए रखना है। बारिश के कारण खदानों से आपूर्ति प्रभावित होने की स्थिति में उत्पादन और परिवहन व्यवस्था को तेजी से सामान्य करना जरूरी होगा। आने वाले दिनों में SECL से कोयले की आवक कितनी बढ़ती है, इसी पर पावर प्लांटों के संचालन की स्थिति काफी हद तक निर्भर करेगी।